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करवा चौथ तथा भारतीय संस्कृति

Updated: Jan 11, 2023





वस्तुतः ऋषि-मुनियों ने सभी के लिए अलग-अलग तरह के व्रत-उपवास आदि का विधान किया है। प्रायः स्त्रियाँ ही संस्कृति को आगे ले जाती हैं और भावी पीढ़ियों को परंपराओं से जोड़े रखती हैं–यह उनका विशेष गुण है। उन्हीं की वजह से भारतीय संस्कृति अविच्छिन्न प्रवाहित हो रही है। करवा चौथ के व्रत के माध्यम से वे स्वयं के भीतर प्रेम और त्याग के भाव को जीवित रखती हैं। व्रत करने के लिए कोई ज़बरदस्ती नहीं है। जो स्वेच्छा से चाहे वह व्रत कर सकता है, जैसा कि अधिकांश विवाहित स्त्रियाँ करती हैं। भारत के अनेक भागों में आज भी करवा चौथ का व्रत न करके स्त्रियाँ अन्य व्रत आदि करती हैं, क्योंकि यह स्थान-विशेष की परंपरा का विषय है।


उपवास का कारण और प्रकार

पुण्य प्राप्ति के लिए किसी पुण्य तिथि में उपवास करने या किसी उपवास के कर्मनुष्ठान द्वारा पुण्य संचय करने के संकल्प को व्रत कहते हैं। व्रत और उपवास द्वारा शरीर को तपाना तप है। व्रत धारण कर, उपवास रखकर पति की मंगलकामना सुहागिन का तप है। तप द्वारा सिद्धि प्राप्त करना पुण्य का मार्ग है। अतः सुहागिन करवा चौथ का व्रत धारण कर उपवास रखती हैं।


कथा मिलती है कि एक बार देवताओं और राक्षसों के मध्‍य भयंकर युद्ध छिड़ा था। लाख उपायों के बावजूद भी देवताओं को सफलता नहीं मिल पा रही थी और दानव थे कि वह हावी हुए जा रहे थे। तभी ब्रह्मदेव ने सभी देवताओं की पत्नियों को करवा चौथ का व्रत करने को कहा। उन्‍होंने बताया कि इस व्रत को करने से उनके पति दानवों से यह युद्ध जीत जाएंगे। इसके बाद कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी ने व्रत किया और अपने पतियों के लिए युद्ध में सफलता की कामना की। कहा जाता है कि तब से करवा चौथ का व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई।


इस दिन गौरी और गणेश जी का षोडशोपचार पूजन करें।

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